उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum badalte nahin qismat ki lakiron ki tarah

हम बदलते नहीं क़िस्मत की लकीरों की तरह

ہم بدلتے نہیں قسمت کی لکیروں کی طرح

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम बदलते नहीं क़िस्मत की लकीरों की तरह
हो के आज़ाद भी जीते हैं अमीरों की तरह

भूले-बिसरे हुए कुछ पल मुझे तन्हा पा कर
आज फिर मुझ पे बरसने लगे तीरों की तरह

शब की इक सा’अत-ए-बेदार में कितने ही सवाल
मुझ से कुछ माँगने आते हैं फ़क़ीरों की तरह

जब कोई नक़्श तराज़ू में यहाँ ज़र की तुला
नज़र आया मुझे कावाक लकीरों की तरह

सोचता हूँ तो लरज़ जाता हूँ ऐ दस्त-ए-हुनर
मैं भी बिक जाऊँगा लोगों के ज़मीरों की तरह

संग-रेज़े जो कभी जम' किए थे मैं ने
इक किरन ने उन्हें चमका दिया हीरों की तरह

बज़्म का रंग इस अंदाज़ से बदला 'मंज़र'
रौशनी आँखों में चुभने लगी तीरों की तरह