उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hawa ki tarh charaghon ko jo bujhata hai

हवा की तरह चराग़ों को जो बुझाता है

ہوا کی طرح چراغوں کو جو بجھاتا ہے

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हवा की तरह चराग़ों को जो बुझाता है
वो आदमी भी कभी रौशनी में आता है

चला गया जो बहुत दूर मेरी दुनिया से
कभी कभी बड़ी शिद्दत से याद आता है

निकाल लाता है ख़ुश-फ़हमियों के 'आलम से
ये कौन है जो मुझे आइना दिखाता है

हुनर जो सीखना चाहूँ ज़माना-साज़ी का
मिरा ज़मीर मिरे रास्ते में आता है

मैं भूल जाता हूँ जिस आदमी के चेहरे को
वो मेरे सामने इक नाम बन के आता है

अभी तक उस में न आया कोई नया किरदार
जो दास्तान ज़माना मुझे सुनाता है

इस ए'तिबार से 'मंज़र' को हम भी जानते हैं
कि वो हमारे दुखों को ग़ज़ल बनाता है