उर्दू शायरी · ग़ज़ल

waqt ke hath se main phisalta hua

वक़्त के हाथ से मैं फिसलता हुआ

وقت کے ہاتھ سے میں پھسلتا ہوا

शायर: Vikas Sharma Raaz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वक़्त के हाथ से मैं फिसलता हुआ
गिर पड़ा हूँ बहुत तेज़ चलता हुआ

धूप ने गुफ़्तुगू बीच में छोड़ दी
हो गया मुंजमिद मैं पिघलता हुआ

गिरहें पड़ती हैं ख़ाक-ए-बदन में मिरी
देख लूँ चाक अगर कोई चलता हुआ

नक़्स है कोई मेरे 'अनासिर में क्या
ऊब जाता हूँ क्यों मैं बहलता हुआ

धूप-दरिया में खुलता है ये रास्ता
सब्ज़ पेड़ों के हमराह चलता हुआ

दिल की वादी में फिर धुंध उतरती हुई
मेरे अन्दर का मौसम बदलता हुआ

आ गया आख़िरश मैं ख़लाओं में 'राज़'
शोर-ओ-ग़ुल की सफ़ों से निकलता हुआ