उर्दू शायरी · ग़ज़ल

waqar-e-zabt yahi dil ko dil bana ke raha

वक़ार-ए-ज़ब्त यही दिल को दिल बना के रहा

وقار ضبط یہی دل کو دل بنا کے رہا

शायर: Aal-e-Raza Raza5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वक़ार-ए-ज़ब्त यही दिल को दिल बना के रहा
जहाँ से दर्द उठा था वहीं समा के रहा

मिज़ाज-ए-यार तुझे क्यों वो ए'तिबार था शाक़
ये आए दिन का तलव्वुन जिसे मिटा के रहा

हवा के रुख़ पे सँभल कर चली तो थी कश्ती
मगर वो रुख़ था कि तूफ़ान ही उठा के रहा

मलाल को थी ये ज़िद अब तिरा ख़याल न आए
ख़याल आ के रहा और मलाल जा के रहा

तुम अपने साथ ज़माने को ले के बदले हो
'रज़ा' भी बदला मगर पास क्या 'रज़ा' के रहा