उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ba-qadr-e-shauq jo ab un ka aasra na raha

ब-क़द्र-ए-शौक़ जो अब उन का आसरा न रहा

بقدر شوق جو اب ان کا آسرا نہ رہا

शायर: Aal-e-Raza Raza5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ब-क़द्र-ए-शौक़ जो अब उन का आसरा न रहा
जिए तो जाते हैं जीने का हौसला न रहा

उसी को हम ने मनाया उसी को छेड़ेंगे
ख़फ़ा भी हो के जो हम से बहुत ख़फ़ा न रहा

ख़याल में भी ये आए तो साँस रुक जाए
कि हम से उन से मोहब्बत का वास्ता न रहा

हमें कुछ उन से थे शिकवे मगर इसी हद तक
कि मुस्कुरा के सुना और कोई गिला न रहा

ग़म-ए-फ़िराक़ ज़रा सी तो आस रहने दे
कहीं मिले तो कहेंगे 'रज़ा' 'रज़ा' न रहा