उर्दू शायरी · ग़ज़ल

utarti kyon ye sari ja rahi hai

उतरती क्यों ये सारी जा रही है

اترتی کیوں یہ ساری جا رہی ہے

शायर: Lokesh Kumar Singh10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उतरती क्यों ये सारी जा रही है
कहाँ मेरी ख़ुमारी जा रही है

नज़र नीची किए फिरते हैं भँवरे
कली की शर्मसारी जा रही है

ठहाकों में हुए तब्दील आँसू
शब-ए-फ़ुर्क़त गुज़ारी जा रही है

अजब मूरख हो सीरत देखते हो
अभी सूरत निखारी जा रही है

कहारों की जगह दिखती हैं ख़ुशियाँ
दुखों की वो सवारी जा रही है

बड़े-छोटों से बच के चल रहे हैं
पुरानी पासदारी जा रही है

लगें जिस की ज़माने भर को नज़रें
नज़र उस की उतारी जा रही है

मियाँ हम भी तो पीछे ही पड़े हैं
ग़ज़ल की रेढ़ मारी जा रही है

यहाँ हाथों में छाले हो गए हैं
वहाँ क़िस्मत सँवारी जा रही है

बिगड़ मत देख बस चुप-चाप 'साहिल'
नदी किस किस पे वारी जा रही है