उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is ke khilte hi har ek samt ujala hoga

इस के खिलते ही हर इक सम्त उजाला होगा

اس کے کھلتے ہی ہر اک سمت اجالا ہوگا

शायर: Lokesh Kumar Singh7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस के खिलते ही हर इक सम्त उजाला होगा
ये तबस्सुम है इसे दर्द ने पाला होगा

जिस ने बचपन से ही दौलत का चलन देखा हो
उस का अंदाज़ ज़माना से निराला होगा

हम को मौजों से उलझने का हुनर आता है
हम को मंजधार ने ख़ुश हो के उछाला होगा

जिस की रातें हों कटीं बर्फ़ के सहराओं में
उस के तलवों में तो ख़्वाबों में भी छाला होगा

जिस की हर बात तुझे तीर सी चुभ जाती है
वो बहर-हाल तिरा चाहने वाला होगा

तू तो इंसान है संदल का कोई पेड़ नहीं
तू ने किस तौर से साँपों को सँभाला होगा

जिन को आता है अदब में भी सियासत करना
उन के काँधों पे ही रेशम का दुशाला होगा