उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jism ke is ghaar mein dikhta hai sab

जिस्म के इस ग़ार में दिखता है सब

جسم کے اس غار میں دکھتا ہے سب

शायर: Lokesh Kumar Singh11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस्म के इस ग़ार में दिखता है सब
रेत के अम्बार में दिखता है सब

चाँदनी का नूर सूरज का ग़ुरूर
मुझ को मेरे यार में दिखता है सब

टूटती उम्मीद मरता हौसला
ढह रही दीवार में दिखता है सब

मौत के दर ज़िंदगी का इंतिज़ार
देखिए बीमार में दिखता है सब

आइने सारे हटा कर रख दिए
घर की हर दीवार में दिखता है सब

हर सफ़र मंज़िल से कितना दूर है
वक़्त की रफ़्तार में दिखता है सब

ज़िंदगी की क्या अना से जंग थी
इस फटी दस्तार में दिखता है सब

क़ुर्बतें रिश्ता मोहब्बत दोस्ती
आज-कल बाज़ार में दिखता है सब

हूँ बहुत गुम-सुम बहुत चुप-चाप पर
बर्फ़ के अंगार में दिखता है सब

सब छुपा लेती है दिलकश गुफ़्तुगू
हाँ मगर किरदार में दिखता है सब

उन को तो 'साहिल' से सब कुछ चाहिए
और हमें मंजधार में दिखता है सब