उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sukhon ki aas hai kab se magar nahin aate

सुखों की आस है कब से मगर नहीं आते

سکھوں کی آس ہے کب سے مگر نہیں آتے

शायर: Lokesh Kumar Singh7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुखों की आस है कब से मगर नहीं आते
मैं वो दरख़्त हूँ जिस पर समर नहीं आते

न जाने कौन सी कश्ती निगल गया दरिया
कि उस के बा'द से इस में भँवर नहीं आते

ये कैसे बर्फ़ के हुजरे में बस गया हूँ मैं
किसी की धूप के टुकड़े इधर नहीं आते

तिरे ख़याल की कैसी है रहगुज़र जिस में
पहाड़ आते हैं लेकिन शजर नहीं आते

कहाँ हैं कौन सी दुनिया में गुम हैं वो बच्चे
कि जिन को याद कभी अपने घर नहीं आते

ये कैसे दैर-ओ-हरम हैं कि जिन की छत पर अब
मोहब्बतों के परिंदे नज़र नहीं आते

तुझी को काट के बे-शक्ल कर गए 'साहिल'
वगर्ना दर्द के धारे किधर नहीं आते