उर्दू शायरी · ग़ज़ल

utar phenko libas tan se ye shahr-e-dil ka riwaj nain hai

उतार फेंको लिबास तन से ये शहर-ए-दिल का रिवाज नईं है

اتار پھینکو لباس تن سے یہ شہر دل کا رواج نئیں ہے

शायर: Nadeem Malik5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उतार फेंको लिबास तन से ये शहर-ए-दिल का रिवाज नईं है
मैं शाहज़ादा हूँ पास मेरे क़लम तो है सर पे ताज नईं है

फ़ुज़ूल बातों में सर्फ़ कर दी हयात जितनी थी पास मेरे
कहा सुना मा'ज़रत कि पास-ए-वफ़ा की भी मुझ में लाज नईं है

हरीफ़ मेरे मुक़ाबले में खड़े हुए हैं तो क्या करूँ मैं
जो कल मिला था वो दोस्त हम-रह बताऊँ कैसे कि आज नईं है

सुख़नवरो हाए बज़्म-ए-ग़म है यहाँ पे बैठे हैं लोग जम कर
हज़ार शा'इर हैं शहर भर के हमारा ‘अजमल-सिराज’ नईं है

बताऊँ क्या दास्तान अपनी सुनाऊँ क्या हाल ज़िंदगी का
'नदीम' मुद्दत से फिर रहा हूँ मिला कोई काम-काज नईं है