उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab bhi palkon se teri band kiya darwaza

जब भी पलकों से तिरी बंद किया दरवाज़ा

جب بھی پلکوں سے تری بند کیا دروازہ

शायर: Nadeem Malik6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब भी पलकों से तिरी बंद किया दरवाज़ा
एक मौहूम सी दस्तक से खुला दरवाज़ा

डर से दीवार पे इक 'अक्स उभर कर आया
जब तिरी याद ने दिल पर था लिखा दरवाज़ा

इस क़दर तुंद हवा थी कि रक़ीबों ने ऐ दोस्त
चाक-दामन की तरह बंद किया दरवाज़ा

क्यों दिलासा न दिया तू ने मिरे गिर्या-गुज़ार
क्यों मिरे सीना पे रख छोड़ दिया दरवाज़ा

आफ़रीं चश्म-ए-मोहब्बत पे मैं इस बार रफ़ीक़
'अक्स होते हुए इस बार जला दरवाज़ा

देख अब ग़ौर से देख आ के मुझे मेरे 'नदीम'
मैं हूँ दीवार में और मुझ में लगा दरवाज़ा