उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh bhi ho jae main asbab nahin dekhunga

कुछ भी हो जाए मैं अस्बाब नहीं देखूँगा

کچھ بھی ہو جائے میں اسباب نہیں دیکھوں گا

शायर: Nadeem Malik5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ भी हो जाए मैं अस्बाब नहीं देखूँगा
तुझ से मिलने के कभी ख़्वाब नहीं देखूँगा

चुप रहूँगा मैं भरे मजमा' में लेकिन मिरे दोस्त
ख़ौफ़-ओ-दहशत-ज़दा आ'साब नहीं देखूँगा

यूँही ख़ामोश रहूँगा मैं तिरी महफ़िल में
तुझ को होता हुआ बेताब नहीं देखूँगा

मैं भी इस ख़ाना-बदोशी की सुहूलत के तुफ़ैल
दिल के सहरा में कभी आब नहीं देखूँगा

रोज़ देखूँगा मोहब्बत के फ़सानों को 'नदीम'
अपनी ख़ुश-फ़हमी के अबवाब नहीं देखूँगा