उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bhala be-KHayali mein kis tarah koi bojh gham ka uTha sakun

भला बे-ख़याली में किस तरह कोई बोझ ग़म का उठा सकूँ

بھلا بے خیالی میں کس طرح کوئی بوجھ غم کا اٹھا سکوں

शायर: Nadeem Malik6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

भला बे-ख़याली में किस तरह कोई बोझ ग़म का उठा सकूँ
तू कहे तो सीने में जान-ए-मन तिरे ग़म का तीर मैं खा सकूँ

तू ही मेरे दिल के क़रीब है तो 'अज़ीज़ है मुझे जान से
मैं कहाँ से लाऊँ वो हौसला तुझे हाल दिल का सुना सकूँ

तुझे सोच सोच के जान-ए-जाँ हुई मुंतशिर मिरी ज़िंदगी
न मैं रो सकूँ न मैं हँस सकूँ न मैं आ सकूँ न मैं जा सकूँ

कहा उस ने हाथ को चूम कर मिरे दर्द-ओ-ग़म का 'इलाज कर
कहा मैं तो ख़ुद हूँ मरीज़-ए-ग़म तिरा बोझ कैसे उठा सकूँ

मिरा पैरहन है फटा हुआ मिरा दिल है ग़म से अटा हुआ
यहाँ कौन है मिरा हमनशीं जिसे दर्द अपना सुना सकूँ

वो 'नदीम' था जो गुज़र गया तिरे 'इश्क़ में यूँही सरगिराँ
दिल-ए-ना-मुराद मुझे बता उसे कैसे ढूँढ़ के ला सकूँ