उर्दू शायरी · ग़ज़ल

us se milne ki bazahir koi tadbir na thi

उस से मिलने की बज़ाहिर कोई तदबीर न थी

اس سے ملنے کی بظاہر کوئی تدبیر نہ تھی

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस से मिलने की बज़ाहिर कोई तदबीर न थी
ख़्वाब ऐसा था कि जिस की कोई ता'बीर न थी

आज उन आँखों में आँसू नज़र आए मुझ को
कैसे कह दूँ कि वफ़ा में मिरी तासीर न थी

सोचता हूँ कि सलामत रही किस तरह वो छत
जिस को रोके हुए जज़्बात की शहतीर न थी

हम समझ पाते कि क्या होना है अगले पल में
इतनी वाज़ेह यहाँ हालात की तस्वीर न थी

मुस्तरद कर दी गई इस लिए दरख़्वास्त मिरी
दीदा-ज़ेब उन की नज़र में मिरी तहरीर न थी

उस को दुनिया-ए-सियासत में मिले हैं ए'ज़ाज़
जिस के पैरों में वफ़ादारी की ज़ंजीर न थी

मुझ को इस शहर-ए-तजाहुल ने नवाज़ा क्यूँकर
अहल-ए-फ़न की जहाँ 'मंज़र' कोई तौक़ीर न थी