उर्दू शायरी · ग़ज़ल

us se daman ko chhuDana bhi nahin chahte hum

उस से दामन को छुड़ाना भी नहीं चाहते हम

اس سے دامن کو چھڑانا بھی نہیں چاہتے ہم

शायर: Parveen Shaghaf7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस से दामन को छुड़ाना भी नहीं चाहते हम
इस क़दर ख़ुद को सताना भी नहीं चाहते हम

हम ने दिल से उसे बाहर तो निकाला है मगर
उस को वीराना बनाना भी नहीं चाहते हम

मैं हूँ खंडर दर-ओ-दीवार भी गिर जाएँगे
उस को दुल्हन सा सजाना भी नहीं चाहते हम

अब तो सूरज की शुआ'ओं ने समेटा है बदन
उस की बाँहों में ठिकाना भी नहीं चाहते हम

रात की रानी मैं बनती रही उस आँगन की
ख़ुद को शर्तों पे मिटाना भी नहीं चाहते हम

सारी हद पार की है हम ने मोहब्बत की मगर
दश्त में कोई दिवाना भी नहीं चाहते हम

रंज-ओ-ग़म अश्कों के शबनम ही 'शग़फ़' काफ़ी हैं
मिस्ल-ए-ख़ैरात ख़ज़ाना भी नहीं चाहते हम