उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo sochta hai tu waisa hi haal thoDi hai

जो सोचता है तू वैसा ही हाल थोड़ी है

جو سوچتا ہے تو ویسا ہی حال تھوڑی ہے

शायर: Parveen Shaghaf7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो सोचता है तू वैसा ही हाल थोड़ी है
समझना झूठ को भी सच कमाल थोड़ी है

है कुछ ही लम्हे को ये ज़ुल्मतों का डेरा भी
कि ज़ीस्त तीरगी भी माह-ओ-साल थोड़ी है

बहुत ग़ुरूर है क्यों तुझ को तेरी शोहरत पर
कि शोहरतों की फ़क़त तू मिसाल थोड़ी है

हैं मुश्किलों से भरी राहें और तन्हा सफ़र
अभी पड़ाव है मंज़िल मआल थोड़ी है

सफ़र में कॉमा को मंज़िल समझने वाले सुन
मिरा 'उरूज अभी है ज़वाल थोड़ी है

तू इतनी हसरतों से मुझ को पढ़ रहा है क्यों
ग़ज़ल में मेरा है तेरा ख़याल थोड़ी है

इन आँसुओं को 'शग़फ़' सब्र कैसे आएगा
ये शाम-ए-हिज्र है सुब्ह-ए-विसाल थोड़ी है