उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hadd-e-junun ke par bhi jati rahi hun main

हद्द-ए-जुनूँ के पार भी जाती रही हूँ मैं

حد جنوں کے پار بھی جاتی رہی ہوں میں

शायर: Parveen Shaghaf6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हद्द-ए-जुनूँ के पार भी जाती रही हूँ मैं
दामन से अपने आग बुझाती रही हूँ में

सब देखते रहे हैं तमाशा खड़े खड़े
हँस कर बदन की ख़ाक उड़ाती रही हूँ मैं

ज़ंजीरों में मिरी कोई झंकार तो नहीं
अश्कों से अपने शोर मचाती रही हूँ मैं

रक्खा है सब ने क़ैद क़फ़स में मुझे मगर
ज़िंदाँ में आफ़्ताब को लाती रही हूँ मैं

खींची थी आसमाँ पे निगह से लकीर इक
आहों से ज़र्ब रूह मिटाती रही हूँ मैं

वहशत में रू-ब-रू जो फ़रिश्ते हुए 'शग़फ़'
हर्फ़-ए-दुआ भी उन को पढाती रही हूँ मैं