उर्दू शायरी · ग़ज़ल

us be-KHabar ko fikr kahan ab idhar ki hai

उस बे-ख़बर को फ़िक्र कहाँ अब इधर की है

اس بے خبر کو فکر کہاں اب ادھر کی ہے

शायर: Haamid Bhusawali7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस बे-ख़बर को फ़िक्र कहाँ अब इधर की है
इक हम कि हम को फ़िक्र उसी बे-ख़बर की है

मुश्किल बहुत है अब कि तबी'अत बहाल हो
ये जो नज़र लगी है किसी बद-नज़र की है

जिस रहगुज़र पे मुश्किलें लेती हैं इम्तिहाँ
हम को तलाश अब भी उसी रहगुज़र की है

इतना बुरा न मान फ़रिश्ता नहीं हूँ मैं
एहसान भूल जाने की फ़ितरत बशर की है

अब किस को जा के दर्द का दुखड़ा सुनाऊँ मैं
ये सब 'अता तो ख़ुद ही मिरे चारागर की है

मैं क्या हूँ क्या बिसात मिरी कुछ नहीं हूँ मैं
ज़र्रा-नवाज़ी आप के हुस्न-ए-नज़र की है

'हामिद' ग़लत है ये कि मुनासिब नहीं है दाम
दस्तार की नहीं है ये क़ीमत तो सर की है