उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ujrat-e-qafiya-paimai nahin milti thi

उजरत-ए-क़ाफ़िया-पैमाई नहीं मिलती थी

اجرت قافیہ پیمائی نہیں ملتی تھی

शायर: Umair Najmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उजरत-ए-क़ाफ़िया-पैमाई नहीं मिलती थी
पहले इस काम में इक पाई नहीं मिलती थी

अब तो महफ़िल में भी आता है अकेला होना
पहले ख़ल्वत में भी तन्हाई नहीं मिलती थी

अगले वक़्तों में भी मिलती थी जहालत को सनद
लेकिन इस दर्जा पज़ीराई नहीं मिलती थी

ऐसे सय्यारे पे रहते थे जहाँ सूरज से
नूर मिलता था तवानाई नहीं मिलती थी

अब तो कुछ नफ़' भी दे जाती है ये जिंस-ए-जुनूँ
पहले लागत भी मिरे भाई नहीं मिलती थी

गिरवी रखते थे बसीरत को बसारत के 'एवज़
उन दिनों मुफ़्त में बीनाई नहीं मिलती थी