उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ujalon ka agar dushman nahin hai

उजालों का अगर दुश्मन नहीं है

اجالوں کا اگر دشمن نہیں ہے

शायर: Zafar Siddiqui9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उजालों का अगर दुश्मन नहीं है
अँधेरों से भी वो बद-ज़न नहीं है

हमारे पास कोई धन नहीं है
बहुत आराम है उलझन नहीं है

मिरे बर्तन में है मेहनत की रोटी
किसी की देग की खुरचन नहीं है

मिरी पोशाक पर क्यूँ हंस रहा है
ये अपनी है तिरी उतरन नहीं है

ग़रीबों के लिए अब भी जहाँ में
कोई मंज़िल कोई मस्कन नहीं है

बड़ा दिलकश है चेहरा ज़िंदगी का
मगर वो रंग वो रोग़न नहीं है

नज़र में रौशनी आए कहाँ से
चराग़-ए-दिल ही जब रौशन नहीं है

कोई क़ातिल नहीं है इस नगर में
मगर बाक़ी कोई गर्दन नहीं है

मिरे घर में 'ज़फ़र' सब कुछ है लेकिन
बराए-नाम भी आँगन नहीं है