उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uge na bij mashaqqat agarche kam nahin ki

उगे न बीज मशक़्क़त अगरचे कम नहीं की

اگے نہ بیج مشقت اگرچہ کم نہیں کی

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उगे न बीज मशक़्क़त अगरचे कम नहीं की
खुला ये बा'द में हम ने ज़मीं ही नम नहीं की

हमें ये डर था कि उक्ता न जाएँ कुछ दिन में
सो क़िस्तवार मोहब्बत की एक दम नहीं की

वो कैसा 'इश्क़ था माथे पे इक शिकन भी न थी
ये कैसा हिज्र है जिस ने कमर भी ख़म नहीं की

जो मुझ से रब्त का ख़्वाहाँ था उस से दूर रहा
किसी की रौशनी इस तीरगी में ज़म नहीं की

जुनूँ के दाग़ हमेशा दिमाग़ पर छोड़े
किसी बदन पे कोई दास्ताँ रक़म नहीं की

जब इख़्तिलाफ़ किया उस ने ज़िमनी बातों पर
तो फिर वो बात जो करने गए थे हम नहीं की

तुझे ये दुख है कि क्यों बात काट दी तेरी
वो जिस की बात थी ख़ुश हो ज़बाँ क़लम नहीं की