उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uDe hain kucha-e-dilbar mein jaan se guzre

उड़े हैं कूचा-ए-दिलबर में जान से गुज़रे

اڑے ہیں کوچۂ دلبر میں جان سے گزرے

शायर: Lutfunnisa Imtiyaz11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उड़े हैं कूचा-ए-दिलबर में जान से गुज़रे
ये जान क्या है कि दोनों जहान से गुज़रे

अगर वो होश-रुबा सर-बसर जो हो महकूम
तो है क़सम कि हर इक आन मान से गुज़रे

बसंती पोश करूँ हाए रे मैं आँखों से
तू ज़ेर-ए-चश्म अगर ख़ूँ-फ़िशान से गुज़रे

क़सम है तुज को छिड़कवा के जम ही जावेगा
जो रंग क़तरा-ए-आब-ए-चकान से गुज़रे

नहीं ख़बर तुझे नासेह कि हम गए काँ तक
तिरे तो अक़्ल-ओ-क़यास-ओ-गुमान से गुज़रे

मैं इक कशिश में पहुँच जाऊँ यार तक अपने
जो तीर छूट के जैसा कमान से गुज़रे

जो छर-छड़ा के दिल-ए-ला-मकाँ करे परवाज़
तवक़्क़ो' है कि नवों आसमान से गुज़रे

ख़याल-ए-यार का तौसन है ख़ुश-ख़िराम मिरा
ख़ुदा कभी न करे ज़ेर-ए-रान से गुज़रे

अगर नसीब ही हो जाए फ़क़्र का मुझे फ़ख़्र
तो ज़िंदगी मिरी क्या इज़्ज़-ओ-शान से गुज़रे

सुख़न हैं हल्क़ा-ए-मिसरा में ज्यूँ दुर-ए-शहवार
है ये रिजा कि क़दर-दाँ के कान से गुज़रे

ऐ 'इम्तियाज़' तू हो ज़ाएर-ए-मदीना हरम
तो क्या सुरूर-ओ-ख़ुशी आन आन से गुज़रे