उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dasht-e-wahshat mein hamara ab hua hai bud-o-bash

दश्त-ए-वहशत में हमारा अब हुआ है बूद-ओ-बाश

دشت وحشت میں ہمارا اب ہوا ہے بود و باش

शायर: Lutfunnisa Imtiyaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दश्त-ए-वहशत में हमारा अब हुआ है बूद-ओ-बाश
सर फिराने को अबस सय्याद करता है तलाश

सरज़निश आलम की और संग-ए-जफ़ा तेरे से आह
शायद अब मीना-ए-दिल होता है ज़ालिम पाश पाश

ये अभी पल में तुझे बर्बाद कर दें मोहतसिब
देख नाहक़ मय-कशों के भेद को करता है फ़ाश

यूँ दिमाग़ अब किस का यारी दे जो शायद कीजिए
पास जा मुनइ'म के बैठे जो कभी बहर-ए-मआश

शे'र कहने का सलीक़ा कुछ नहीं है 'इम्तियाज़'
है मगर इतना कि ये रखता है टुक ग़म का तराश