उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tumhaare wasl ka lamha bhi yun guzara tha

तुम्हारे वस्ल का लम्हा भी यूँ गुज़ारा था

تمہارے وصل کا لمحہ بھی یوں گزارا تھا

शायर: Aarib Hashmi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम्हारे वस्ल का लम्हा भी यूँ गुज़ारा था
ज़बाँ पे शे'र था सीने में एक आरा था

नहीं ज़मीं पे अकेले नहीं रहे हम लोग
ख़ुदा के बा'द कोई और भी हमारा था

हवा ये पूछती फिरती है हर मुसाफ़िर से
उताक़-ए-हिज्र से किस ने दिया उतारा था

तुम्हारे नाम पे होते थे दिन के हंगामे
तुम्हारी याद ने सुब्हों का रूप धारा था

मैं एक ख़्वाब में पहुँचा था उस किनारे तक
वहाँ पे चाक था कूज़े थे और गारा था

वगरना मैं कहाँ आता अजल की बातों में
मुझे तो तेरी मोहब्बत ने आ के मारा था

इसी लिए तो बुलंदी नहीं मिली मुझ को
फ़लक से दूर मिरे बख़्त का सितारा था

मैं अश्क अश्क गिराता रहा नगीं 'आरिब'
मगर ये हार पिरोना किसे गवारा था