उर्दू शायरी · ग़ज़ल

falak ka bojh zamin ko uThana paDta hai

फ़लक का बोझ ज़मीं को उठाना पड़ता है

فلک کا بوجھ زمیں کو اٹھانا پڑتا ہے

शायर: Aarib Hashmi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़लक का बोझ ज़मीं को उठाना पड़ता है
और इक मदार में ख़ुद को घुमाना पड़ता है

ये रात कटती है उम्मीद-ए-सुब्ह-ए-नौ में मिरी
ये दिन सुकूँ की तलब में बिताना पड़ता है

मिले न जब कोई सानी हमारा दुनिया को
तो अपने पहलू से ख़ुद को उठाना पड़ता है

तमाम लोग तो चेहरा-शनास होते नहीं
इसी लिए तो क़बीला बताना पड़ता है

कभी कभार ये वहशत बराए नाम रहे
कभी कभार तो मंज़र पे आना पड़ता है

तू अपने ताक़ में अपना दिया जलाए रख
हम अहल-ए-दिल हैं हमें दिल जलाना पड़ता है

उन्ही से पूछ मोहब्बत की शो'लगी है क्या
कि ज़ख़्म खा के जिन्हें मुस्कुराना पड़ता है

फिर इस के बा'द कहीं लौटती है बीनाई
हर एक आँख से मंज़र उठाना पड़ता है

तिरी शराब की 'इज़्ज़त बचाने की ख़ातिर
बिना पिए भी हमें लड़खड़ाना पड़ता है

वो मुझ से पूछ ले शायद कभी पसंद मिरी
सो हर ख़याल को मंज़र पे लाना पड़ता है

'अलामतों को समझता नहीं कोई 'आरिब'
हमें चराग़ का मा'नी बताना पड़ता है