उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghamon ki dhup thi aur saeban na milta tha

ग़मों की धूप थी और साएबाँ न मिलता था

غموں کی دھوپ تھی اور سائباں نہ ملتا تھا

शायर: Aarib Hashmi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़मों की धूप थी और साएबाँ न मिलता था
घरों से निकले हुओं को मकाँ न मिलता था

हमारे पाँव के नीचे ज़मीन थी लेकिन
हमारे सर पे कोई आसमाँ न मिलता था

तुम्हारा खोया हुआ लम्स अपने कमरे में
वहीं पे ढूँढ रहे थे जहाँ न मिलता था

जो दर्द हम ने सँभाला हुआ था सीने में
किसे सुनाते कोई मेहरबाँ न मिलता था

जो साँस साँस मयस्सर रहा मुझे बरसों
बिछड़ गए तो फिर उस का निशाँ न मिलता था

नई नई थी मोहब्बत मगर दिलों में थी
ये ऐसी आग थी जिस का धुआँ न मिलता था

वो रोज़ बाग़ में आती थी सैर करने को
परिंदे ख़ुश थे उन्हें आब-ओ-दाना मिलता था

ये लोग जिस के बहाओ के गीत गाते थे
हमें वो दरिया कभी भी रवाँ न मिलता था

हम ऐसे बोलने वाले कहाँ थे पर 'आरिब'
वो बोलता तो हमें भी बहाना मिलता था