उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tumko to kabhi dil se bulana nahin aata

तुम को तो कभी दिल से बुलाना नहीं आता

تم کو تو کبھی دل سے بلانا نہیں آتا

शायर: Aal-e-Raza Raza8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम को तो कभी दिल से बुलाना नहीं आता
हम आ के जो बैठे हैं तो जाना नहीं आता

कह दूँ तो मज़े पर ये फ़साना नहीं आता
ठहरूँ तो पलट कर ये ज़माना नहीं आता

काहे को ये फिर होश में लाने के ठहोके
जाओ तुम्हें दीवाना बनाना नहीं आता

आती है बहार और लुटा देती है दौलत
इक फूल की मुट्ठी में ख़ज़ाना नहीं आता

तुम को तो ये आता है कि याद आए चले जाओ
हम तुम को भुलाएँ तो भुलाना नहीं आता

मक़्दूर था बस एक ही सज्दा तिरे दर पर
सर मैं ने झुकाया है उठाना नहीं आता

आती है हमें सिर्फ़ मोहब्बत की ग़ुलामी
एहसान मोहब्बत का जताना नहीं आता

फिर लाख मोहब्बत को 'रज़ा' कोई सँवारे
आग़ाज़-ए-मोहब्बत का ज़माना नहीं आता