उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tishnagi wo thi ki jo ruh tak aai na gai

तिश्नगी वो थी कि जो रूह तक आई न गई

تشنگی وہ تھی کہ جو روح تک آئی نہ گئی

शायर: Umood Abrar Ahmad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिश्नगी वो थी कि जो रूह तक आई न गई
जिस्म की प्यास लबों से भी बुझाई न गई

मैं ने हर सम्त ही देखा है उसे जान-ए-बहार
गर्दिश-ए-वक़्त की तस्वीर घुमाई न गई

हाए वो ख़ून के प्यासे हैं उन्हें क्या मा'लूम
लाश माँ बाप की बच्चों से उठाई न गई

एक दिन बाग़-ए-तिलिस्मात में देखा मैं ने
सब्ज़ पेड़ों को कोई बात सुनाई न गई

बारहा देखा है यक-तरफ़ा तमाशा मैं ने
ख़ाक इस दश्त-नवर्दी में उड़ाई न गई

हम ने कोशिश तो बहुत की थी मगर हम से ऐ दोस्त
इक तिरी याद थी जो हम से भुलाई न गई

उस की तमसील-गरी देख के अंदाज़ा हुआ
हम से क्यों ख़ाक-बसर ज़ीस्त कमाई न गई

उन के क़दमों की मैं आहट से ही पहचान गई
दर-ओ-दीवार को आवाज़ लगाई न गई

सब ने इस मुल्क को लूटा है महारत से 'उमूद'
हुक्मरानों से यही बात छुपाई न गई