उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri kami se KHushi ka bohran baDh gaya hai

तिरी कमी से ख़ुशी का बोहरान बढ़ गया है

تری کمی سے خوشی کا بحران بڑھ گیا ہے

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी कमी से ख़ुशी का बोहरान बढ़ गया है
सो शहर में ख़ुदकुशी का रुज्हान बढ़ गया है

हमारा इक और दोस्त आज उस को देख आया
हमारे हल्क़े में एक हैरान बढ़ गया है

भरूँगा मैं शाहराह-ए-ग़म पर इज़ाफ़ी महसूल
मुक़र्ररा हद से मेरा सामान बढ़ गया है

जुनूँ लगाया था 'इश्क़ के कारोबार में सब
तू नफ़' छोड़ अस्ल ज़र से नुक़सान बढ़ गया है

तू ग़ैर-मौजूदगी में भी है कुछ इतना मौजूद
ख़ुदा की मौजूदगी पे ईमान बढ़ गया है

इसे बढ़ाया तो कोई शिरयान फट न जाए
फ़िशार-ए-ख़ून इस ग़ज़ल के दौरान बढ़ गया है

गए वो दिन जान दे के जब जान छूट जाती
'उमैर' अब आगही का तावान बढ़ गया है