उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri bala se gham-e-rozgar ab bhi hai

तिरी बला से ग़म-ए-रोज़गार अब भी है

تری بلا سے غم روزگار اب بھی ہے

शायर: Balwan Singh Azar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी बला से ग़म-ए-रोज़गार अब भी है
मिरे वुजूद में तेरा शुमार अब भी है

ज़मीं से उठ के सितारा बना लिया ख़ुद को
फ़लक से पूछ तिरा इंतिज़ार अब भी है

पहेली हल न हुई तेरे हुस्न की मुझ से
मिरी निगाह में ये पेचदार अब भी है

तुम्हारे वस्ल से मुझ में गुलाब खिलते हैं
मिरे बदन में तिलिस्म-ए-बहार अब भी है

सफ़र से लौट के बिस्तर पे सो चुका हूँ मैं
मगर थकन पे चमकता ग़ुबार अब भी है