उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apni achchhi buri auqat jie jata hun

अपनी अच्छी बुरी औक़ात जिए जाता हूँ

اپنی اچھی بری اوقات جئے جاتا ہوں

शायर: Balwan Singh Azar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपनी अच्छी बुरी औक़ात जिए जाता हूँ
ख़ुद को जीना है सो हज़रात जिए जाता हूँ

दिन निकलता है तो दिन की ही तलब रहती है
रात होती है तो फिर रात जिए जाता हूँ

बीच का कुछ भी मुझे याद नहीं रहता है
आख़िरी पहली मुलाक़ात जिए जाता हूँ

वो बदन यूँ भी तलबगार नहीं है मेरा
वस्ल में हिज्र के लम्हात जिए जाता हूँ

मुझ को हर चीज़ में इम्कान नज़र आते हैं
रौशनी जब भी तिरे साथ जिए जाता हूँ