उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere suKHan ke mah-o-KHur teri nazar ke charagh

तिरे सुख़न के मह-ओ-ख़ुर तिरी नज़र के चराग़

ترے سخن کے مہ و خور تری نظر کے چراغ

शायर: Qamar Sanbhali8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे सुख़न के मह-ओ-ख़ुर तिरी नज़र के चराग़
उन्हीं के दम से हैं रौशन मिरे हुनर के चराग़

ज़मीं से ता-ब-फ़लक कहकशाँ सी बिखरी हुई
हक़ीक़तन हैं फ़रोज़ाँ किसी सफ़र के चराग़

ब-हर ज़माना उन्हें आँधियों से लड़ना है
तुम्हारे घर के दिए हों कि मेरे घर के चराग़

वहाँ पे भी इसी तहज़ीब का उजाला है
जले उधर की मुंडेरों पे भी इधर के चराग़

अब उन के साथ हवा देखें क्या सुलूक करे
जला तो आए हैं हम फ़िक्र-ए-मो'तबर के चराग़

बचाए रक्खें ज़रा आप अपने दामन को
न दें इन्हें कहीं लौ मेरी चश्म-ए-तर के चराग़

कभी जो आख़िर-ए-शब आँखें नम हुईं अपनी
दु'आ के होंटों पे रौशन हुए असर के चराग़

वरक़ वरक़ हैं मुनव्वर जो शे'र की सूरत
ख़ुदा करे न कभी गुल हों ये 'क़मर' के चराग़