उर्दू शायरी · ग़ज़ल

burida-par the jasarat parind kya karte

बुरीदा-पर थे जसारत परिंद क्या करते

بریدہ پر تھے جسارت پرند کیا کرتے

शायर: Qamar Sanbhali9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बुरीदा-पर थे जसारत परिंद क्या करते
हवा से लड़ने की हिम्मत परिंद क्या करते

परों को तौला बहुत यूँ तो अब की रुत में भी
थे आगे बर्फ़ के पर्बत परिंद क्या करते

क़फ़स से छूट के भी आसमाँ का रुख़ न किया
कि तर्क बरसों की 'आदत परिंद क्या करते

हर एक तीर का रुख़ था उन्हीं की सम्त यहाँ
किसी से कोई शिकायत परिंद क्या करते

हैं दस्तरस में तिरी तीर भी हवाएँ भी
तिरे ख़िलाफ़ बग़ावत परिंद क्या करते

वो पेड़ कट गए जिन पर था आशियाँ उन का
अगर न होती मिरी छत परिंद क्या करते

हुई गिरफ़्त ज़रा ढीली कर गए परवाज़
शिकारियों से मुरव्वत परिंद क्या करते

फ़ज़ा में छाई थी हद्द-ए-नज़र तक आग ही आग
उड़ान भरने की जुरअत परिंद क्या करते

चमन को छोड़ के जाँ बच गई ग़नीमत है
'क़मर' न करते जो हिजरत परिंद क्या करते