उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum faiz raushni se uThaenge kitni der

हम फ़ैज़ रौशनी से उठाएँगे कितनी देर

ہم فیض روشنی سے اٹھائیں گے کتنی دیر

शायर: Qamar Sanbhali10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम फ़ैज़ रौशनी से उठाएँगे कितनी देर
जुगनू हमारे सहन में ठहरेंगे कितनी देर

कब तक नुमू-पज़ीर रहेगा ये दश्त-ए-दिल
बादल ख़ुशी के बरसें तो बरसेंगे कितनी देर

तोड़ो त'अल्लुक़ात की बैसाखियाँ तमाम
झूटे सहारे साथ निबाहेंगे कितनी देर

साया सरों को देंगे कहाँ तक बुज़ुर्ग लोग
बे-बर्ग ख़ुश्क पेड़ हवा देंगे कितनी देर

कब तक रहेंगे क़ैद-ए-अना के हिसार में
काग़ज़ की नाव आप चलाएँगे कितनी देर

शो'ला भड़क के ख़त्म हुआ राख हो गया
हम राख में शरर कोई ढूँडेंगे कितनी देर

तार-ए-नफ़स के साथ थे रिश्तों के सिलसिले
मेरे 'अज़ीज़ क़ब्र पे ठहरेंगे कितनी देर

दो चार लहरें मेरे सफ़ीने को हैं बहुत
साहिल से आप डूबते देखेंगे कितनी देर

कितना कोई किसी के बिछड़ने का ग़म करे
हम भी किसी के वास्ते रोएँगे कितनी देर

मूँदे रहेंगे कब तलक आँखों को हम 'क़मर'
ख़्वाबों को टूटने से बचाएँगे कितनी देर