उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud ko samajh raha tha buland aasman se

ख़ुद को समझ रहा था बुलंद आसमान से

خود کو سمجھ رہا تھا بلند آسمان سے

शायर: Qamar Sanbhali5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद को समझ रहा था बुलंद आसमान से
वो पाश-पाश हो गया गिर कर चटान से

फिर शहर में मिरे लिए हर काम सहल था
दीवार अना की हट गई जब दरमियान से

ज़हर-ए-हयात का कभी चक्खा था ज़ाइक़ा
तल्ख़ी गई न आज तलक भी ज़बान से

मोहतात हो के बाँध निशाना मिरी तरफ़
ये तीर भी ख़ता न हो चल कर कमान से

है कुछ न कुछ ज़रूर 'क़मर' उस से राब्ता
उस का बयान मिलता है तेरे बयान से