उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chhat kaT rahi hai kabhi dar kaT raha hai

छत काट रही है कभी दर काट रहा है

چھت کاٹ رہی ہے کبھی در کاٹ رہا ہے

शायर: Qamar Sanbhali8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

छत काट रही है कभी दर काट रहा है
ख़ाली है मकीनों से तो घर काट रहा है

तलवों में चुभे जाते हैं एहसास के काँटे
तुम साथ नहीं हो तो सफ़र काट रहा है

अल्फ़ाज़ की तासीर कि जादू है ज़बाँ का
लहजे से वो पत्थर का जिगर काट रहा है

दूकान सजाई है कहाँ शीशा-गरों ने
हर शख़्स जहाँ दस्त-ए-हुनर काट रहा है

दामन हुआ जाता है समंदर का कुशादा
हर आन किनारों को भँवर काट रहा है

रिश्तों का तक़द्दुस है न कुछ पास लहू का
इक भाई यहाँ भाई का सर काट रहा है

गिरती हुई दीवार का लम्हा है नज़र में
सहमे हुए बच्चों को वो डर काट रहा है

है शग़्ल भी ज़िंदानी-ए-दुनिया का 'क़मर' ख़ूब
कटती नहीं ज़ंजीर मगर काट रहा है