उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajab hiras ka manzar tamam shahr mein tha

'अजब हिरास का मंज़र तमाम शहर में था

عجب ہراس کا منظر تمام شہر میں تھا

शायर: Qamar Sanbhali5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अजब हिरास का मंज़र तमाम शहर में था
हर एक शख़्स घिरा आंधियों के क़हर में था

उभरते डूबते मंज़र रहे निगाहों में
मैं किन बदलते हुए मौसमों के शहर में था

तमाम 'उम्र रिहाई किसी तरह न मिली
घिरा हुआ मैं 'अजब आगही के क़हर में था

मिला न कुछ भी मुझे सारा पढ़ गया दीवान
ये और बात हर इक शे'र उस का बहर में था

वो आहटें थीं 'क़मर' उस के नर्म क़दमों की
कि घुंघरू का तरन्नुम हवा की लहर में था