उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere jalwon ka wo aalam nahin hai

तिरे जल्वों का वो आलम नहीं है

ترے جلووں کا وہ عالم نہیں ہے

शायर: Sabir Abuhari8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे जल्वों का वो आलम नहीं है
शुऊ'र-ए-दीद वर्ना कम नहीं है

निज़ाम-ए-ज़िंदगी है मुंतशिर सा
मिज़ाज-ए-यार तो बरहम नहीं है

कभी लज़्ज़त-कश-ए-राहत न होंगे
मयस्सर जिन को तेरा ग़म नहीं है

दिया है ग़म ज़माने भर का मुझ को
इनायत ये भी तेरी कम नहीं है

हमें उम्मीद हो क्यों कर करम की
सितम भी जब तिरा पैहम नहीं है

नवाज़िश हो गई जिस पर जुनूँ की
उसे दुनिया में कोई ग़म नहीं है

मयस्सर है तिरी आँखों की मस्ती
मुझे सौदा-ए-जाम-ए-जम नहीं है

सलीक़ा हो अगर जीने का 'साबिर'
हयात-ए-चंद-रोज़ा कम नहीं है