उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har dam nigah mein tera husn-o-jamal hai

हर दम निगाह में तिरा हुस्न-ओ-जमाल है

ہر دم نگاہ میں ترا حسن و جمال ہے

शायर: Sabir Abuhari9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर दम निगाह में तिरा हुस्न-ओ-जमाल है
ख़म्याज़ा-ए-बहार का किस को ख़याल है

जो नक़्श-ए-आरज़ी थे वो सब दिल से मिट गए
बाक़ी जो रह गया है वो तेरा ख़याल है

ना-पाएदारियों पे है बुनियाद-ए-ज़िंदगी
अंजाम हर कमाल का इक दिन ज़वाल है

ऐ शैख़ हम को रहमत-ए-यज़्दाँ पे है यक़ीं
महशर की बाज़-पुर्स का किस को ख़याल है

हम जानते हैं ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ख़ूब है मगर
ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ बहार में लेकिन मुहाल है

आए तिरे हुज़ूर ये तौफ़ीक़ है किसे
देखे तेरा जमाल ये किस की मजाल है

जिस को ज़रा भी छू गई सरशार कर गई
साक़ी तिरी निगाह में ये क्या कमाल है

ये कौन सा मक़ाम है ऐ बे-ख़ुदी बता
है ख़ौफ़-ए-हिज्र दिल में न शौक़-ए-विसाल है

'साबिर' यहाँ सबात किसी चीज़ को नहीं
बस ग़म ही एक चीज़ है जो ला-ज़वाल है