उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haqiqat ban gai KHud hi hijab aahista aahista

हक़ीक़त बन गई ख़ुद ही हिजाब आहिस्ता आहिस्ता

حقیقت بن گئی خود ہی حجاب آہستہ آہستہ

शायर: Sabir Abuhari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ीक़त बन गई ख़ुद ही हिजाब आहिस्ता आहिस्ता
नज़र को ले मरा ज़ौक़-ए-सराब आहिस्ता आहिस्ता

तड़प पैदा तो कर दिल में रुख़-ए-ज़ेबा के सौदाई
सरक जाएगा ख़ुद उन का नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

सलीक़ा आ गया है शैख़ को भी होश-मंदी का
लगा है माँगने जाम-ए-शराब आहिस्ता आहिस्ता

जहान-ए-आब-ओ-गिल भी देखने की चीज़ थी लेकिन
बशर ने कर दिया उस को ख़राब आहिस्ता आहिस्ता

कोई दिन के हैं जल्वे मस्तियाँ भर दो फ़ज़ाओं में
गुज़र जाएगा ये अहद-ए-शबाब आहिस्ता आहिस्ता

बशर अब रोकने को है मह-ओ-अंजुम की गर्दिश को
ये देखेगा ख़ुदाई के भी ख़्वाब आहिस्ता आहिस्ता

ये रूदाद-ए-मोहब्बत है इसे कहना तहम्मुल से
सुना जाएगा ऐ 'साबिर' ये बाब आहिस्ता आहिस्ता