उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere dimagh mein bachpan ki lash thoDi hai

तिरे दिमाग़ में बचपन की लाश थोड़ी है

ترے دماغ میں بچپن کی لاش تھوڑی ہے

शायर: Saba Tabish5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे दिमाग़ में बचपन की लाश थोड़ी है
मिरी तरह तुझे फ़िक्र-ए-मआ'श थोड़ी है

हमारे हाँ तो नहीं चलता हुक्म का इक्का
हमारा खेल मोहब्बत है ताश थोड़ी है

जहाँ से चाहा उठा कर चखा रखा वापस
शुऊर-ए-ज़ात किसी फल की क़ाश थोड़ी है

छुपाना पड़ता है दिल का मोआमला अक्सर
अकेले मिलते हैं ये राज़ फ़ाश थोड़ी है

'सबा' किसी के लिए दर-ब-दर नहीं रहती
ख़ुदाई को भी ख़ुदा की तलाश थोड़ी है