उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hisar-e-hijr ke jughrafie samajh aae

हिसार-ए-हिज्र के जुग़राफ़िए समझ आए

حصار ہجر کے جغرافیے سمجھ آئے

शायर: Saba Tabish7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हिसार-ए-हिज्र के जुग़राफ़िए समझ आए
जब अपने दूर हुए मरसिए समझ आए

मैं वापस आ के बताऊँगी उन का हाल तुम्हें
अगर मज़ार पे जलते दिए समझ आए

तुम्हारे इश्क़ की इन साअ'तों के बा'द हमें
मुसव्विरी के नए ज़ाविए समझ आए

तराश डालूँगी अल्फ़ाज़ को ब-सूरत-ए-शेर
ग़ज़ल के जूँही मुझे क़ाफ़िए समझ आए

वो लिखने वाले ने लिक्खे थे बुग़्ज़ में जल कर
मुअर्रख़ीन को जो हाशिए समझ आए

हमें पसंद न था मुश्किलों में रहना भी
सो जितने रोज़ जहाँ में जिए समझ आए

बहुत से नक़्श अधूरे हैं अब तलक 'ताबिश'
बहुत से लोग तुम्हारे लिए समझ आए