उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tera firaq KHizan mein mile to achchha ho

तिरा फ़िराक़ ख़िज़ाँ में मिले तो अच्छा हो

ترا فراق خزاں میں ملے تو اچھا ہو

शायर: Vikas Sharma Raaz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरा फ़िराक़ ख़िज़ाँ में मिले तो अच्छा हो
मैं चाहता हूँ उदासी का रंग गहरा हो

बदन की सम्त भी निकलो कभी कि मुमकिन है
तुम्हें तलाश है जिस की यही वो रस्ता हो

रुतों के रम्ज़ कभी मुन्कशिफ़ भी हों हम पर
धनक-शनास हों हम ज़ात में इज़ाफ़ा हो

हम अपनी रौशनी से ख़ुद बहुत पशेमाँ हैं
हवा गले से लगा ले तो ख़त्म क़िस्सा हो

बड़ा हसीन-ओ-दिल-आवेज़ है ये शह्र तिरा
मगर वो शख़्स कि जिस को उदास रहना हो

तमाम ख़दशे हमारे ग़लत निकल आएँ
ख़ुदा करे ये ख़ला कहकशाँ में खुलता हो

ये आसमाँ मुझे इस तरह देखता है 'राज़'
कि जैसे मैं ने कभी इस का कुछ बिगाड़ा हो