उर्दू शायरी · ग़ज़ल

Thahar ke dekhte hum raston ke manzar bhi

ठहर के देखते हम रास्तों के मंज़र भी

ٹھہر کے دیکھتے ہم راستوں کے منظر بھی

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ठहर के देखते हम रास्तों के मंज़र भी
जो तेज़ धूप न होती हमारे सर पर भी

बदल सका न मकानों की कोहनगी का मिज़ाज
वही फ़ज़ा रही दीवार-ओ-दर सजा कर भी

मैं इस क़दर हुआ अपना कि ये भी भूल गया
बसी हुई कोई दुनिया है मेरे बाहर भी

शिकस्त-ओ-फ़त्ह मिरे साथ साथ चलती है
मैं अपने 'अह्द का पोरस भी हूँ सिकंदर भी

ये सर का ताज मिरी आख़िरी शनाख़्त नहीं
कि मेरी ज़ात में पिन्हाँ है इक गदागर भी

वहाँ भी मुझ को नज़र आ गया हरीफ़ मिरा
टला न ख़तरा-ए-जाँ रास्ता बदल कर भी

करूँ मैं ज़ाहिरी मंज़र का क्या गिला 'मंज़र'
मिले हैं मुझ को अंधेरे दिलों के अंदर भी