उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri jafa hui ki jahan ka ghazab hua

तेरी जफ़ा हुई कि जहाँ का ग़ज़ब हुआ

تیری جفا ہوئی کہ جہاں کا غضب ہوا

शायर: Lais Quraishi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तेरी जफ़ा हुई कि जहाँ का ग़ज़ब हुआ
हम पर तो जो सितम भी हुआ बे-सबब हुआ

इस साअ'त-ए-सईद को क्या नाम दीजिए
इंसाँ असीर-ए-वक़्त के ज़िंदाँ में जब हुआ

शो'ला-सिफ़त हैं रक़्स में अपने चमन के फूल
इस आलम-ए-बहार में ये क्या ग़ज़ब हुआ

शायद यही मज़ाक़-ए-तलब की है इंतिहा
दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में भी दिल बे-तलब हुआ

मुंसिफ़ को मस्लहत की ज़बाँ रास आ गई
गो फ़ैसला हुआ मगर इंसाफ़ कब हुआ

उस को नसीब हो न सका रिश्ता-ए-ख़ुलूस
जो क़ाइल-ए-क़ज़िया-ए-हसब-ओ-नसब हुआ

जारी है एक तीरगी-ओ-रौशनी की जंग
जब से शुऊर-ए-सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब हुआ

हद-ए-निगाह तक कहीं शो'ले कहीं धुआँ
ये ख़ाक-ओ-ख़ूँ का खेल गुलिस्ताँ में कब हुआ

इस हादसे पे आप का जो तब्सिरा भी हो
मैं आश्ना-ए-महफ़िल-ए-ऐश-ओ-तरब हुआ

कैसे हो तुम को लज़्ज़त-ए-आज़ाद जाँ-नसीब
दुश्वार मरहलों से गुज़रना ही कब हुआ

कितने 'अज़ीम लोग तह-ए-ख़ाक हो गए
तू भी हुआ जो 'लैस' तो फिर क्या 'अजब हुआ