उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tamasha KHud ko jo hum su-e-dar karte hain

तमाशा ख़ुद को जो हम सू-ए-दार करते हैं

تماشا خود کو جو ہم سوئے دار کرتے ہیں

शायर: Dard Faiz Khan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तमाशा ख़ुद को जो हम सू-ए-दार करते हैं
जो शादमाँ हैं उन्हें सोगवार करते हैं

वो हम को छोड़ गया है परिंद की मानिंद
दरख़्त बन के सो हम इंतिज़ार करते हैं

भुला सके नहीं हम तुझ को एक भी लम्हा
मगर भुलाने की कोशिश हज़ार करते हैं

कभी ये सोचा है तू ने कि हम से दीवाने
किसी के इश्क़ में क्यों जाँ-निसार करते हैं

यक़ीन कीजे न कीजे ये आप की मर्ज़ी
मिरे चराग़ हवा का शिकार करते हैं

जो पूछते हैं कि करते हैं कितना प्यार उन से
शुमार कैसे हो जब बे-शुमार करते हैं

वो 'फ़ैज़' करते हैं वा'दा हर एक ही झूटा
ख़ता हमारी जो हम ए'तिबार करते हैं