उर्दू शायरी · ग़ज़ल

husn wale bazm mein inkar hi karte rahe

हुस्न वाले बज़्म में इंकार ही करते रहे

حسن والے بزم میں انکار ہی کرتے رہے

शायर: Dard Faiz Khan8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुस्न वाले बज़्म में इंकार ही करते रहे
इश्क़ वाले इश्क़ का इज़हार ही करते रहे

जीना मरना अपना हम दुश्वार ही करते रहे
उन की हर इक बात का इक़रार ही करते रहे

हम को देखो हम उन्हीं पर हो गए दिल से फ़िदा
जो हमारी ज़ात को मिस्मार ही करते रहे

तेरे दिल में कौन है ये तो कभी पूछा नहीं
जान-ए-जाँ हम तो तिरा दीदार ही करते रहे

हम सदा चुनते रहे सब ख़ार जिन की राह से
वो हमारी राह को पुर-ख़ार ही करते रहे

मेरे अपनों ने किया है मुझ पे ये कैसा सितम
वो मुझे उस पार से इस पार ही करते रहे

कोई भी उन के मरज़ की ला नहीं पाया दवा
वो तो चारागर को भी बीमार ही करते रहे

चंद लम्हे भी सुकूँ के मिल न पाए उन के साथ
'फ़ैज़' को वो दर्द से दो-चार ही करते रहे