उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tamam raat wo jaga kisi ke wade par

तमाम रात वो जागा किसी के वा'दे पर

تمام رات وہ جاگا کسی کے وعدے پر

शायर: Vafa Malikpuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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तमाम रात वो जागा किसी के वा'दे पर
'वफ़ा' को आ ही गई नींद रात ढलने पर

जो सब का दोस्त था हर अंजुमन की रौनक़ था
कल उस की लाश मिली उस के घर के मलबे पर

हर एक दोस्त के चेहरे को ग़ौर से देखा
फ़क़त ख़ुलूस का ग़ाज़ा था सब के चेहरे पर

वो ज़ौक़-ए-फ़न हो कि शाख़-ए-चमन कि ख़ाक-ए-वतन
हर इक का हक़ है मिरे ख़ूँ के क़तरे क़तरे पर

चमन में यूँ तो थे कुछ और आशियाँ लेकिन
गिरी जो बर्क़ तो मेरे ही आशियाने पर

हक़ीक़तें नज़र आईं तो किस तरह उन को
तअ'स्सुबात की ऐनक है जिन के चेहरे पर

करम मुझी पे था सब बाग़बान-ओ-गुलचीं का
किसी ने क़ैद किया और किसी ने नोचे पर

ये दश्त-ए-हुज़्न है कर्ब-ओ-बला का सहरा है
चलेगा कौन यहाँ अब 'वफ़ा' के रस्ते पर