उर्दू शायरी · ग़ज़ल

buton ka sath diya but-shikan ka sath diya

बुतों का साथ दिया बुत-शिकन का साथ दिया

بتوں کا ساتھ دیا بت شکن کا ساتھ دیا

शायर: Vafa Malikpuri10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बुतों का साथ दिया बुत-शिकन का साथ दिया
फ़रेब-ए-इश्क़ ने हर हुस्न-ए-ज़न का साथ दिया

मिरे सुकूत ने कब अंजुमन का साथ दिया
तुम्हारी चश्म-ए-सुख़न-दर-सुख़न का साथ दिया

तुम्हारे गेसू-ए-पुर-ख़म पे मरने वालों ने
जब आया वक़्त तो दार-ओ-रसन का साथ दिया

बहार आई तो महरूम-ए-रंग-ओ-बू हैं वही
जुनूँ ने दौर-ए-ख़िज़ाँ में चमन का साथ दिया

बुझे जो पिछले पहर तेरी अंजुमन के चराग़
तो दाग़-ए-दिल ने मिरे अंजुमन का साथ दिया

चमन में एक हमीं रह गए ख़िज़ाँ के लिए
कि बुलबुलों ने भी रंग-ए-चमन का साथ दिया

ख़ुदा की शान कि नंग-ए-वतन वो कहलाएँ
जिन्हों ने मर के भी ख़ाक-ए-वतन का साथ दिया

ख़ुदा का शुक्र कि मय्यत तो ढक गई अपनी
ग़ुबार-ए-राह ने इक बे-कफ़न का साथ दिया

कभी जो बज़्म में उस बुत की बात आ निकली
जनाब-ए-शैख़ ने भी बरहमन का साथ दिया

वो तर्ज़-ए-नौ हो कि तर्ज़-ए-कुहन 'वफ़ा' हम ने
हर एक तरह मज़ाक़-ए-सुख़न का साथ दिया