उर्दू शायरी · ग़ज़ल

husn-e-KHud-bin ka ishaara mujhe malum na tha

हुस्न-ए-ख़ुद-बीं का इशारा मुझे मालूम न था

حسن خود بیں کا اشارہ مجھے معلوم نہ تھا

शायर: Vafa Malikpuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुस्न-ए-ख़ुद-बीं का इशारा मुझे मालूम न था
उन की आँखों में है शिकवा मुझे मालूम न था

अब सिवा मर्सिया-ए-कम-निगही क्या कहिए
सामने था मिरे जल्वा मुझे मालूम न था

मुझ को शिकवा नहीं कुछ आतिश-ए-गुल से लेकिन
आशियाँ यूँ भी जलेगा मुझे मालूम न था

गुम हुई गेसू-ए-जानाँ की सियाही इस में
इतनी तारीक है दुनिया मुझे मालूम न था

ख़ून-ए-दिल जिस के लिए सर्फ़ किया है मैं ने
वो है तारीक उजाला मुझे मालूम न था

दूर तक नक़्श-ए-क़दम है न निशान-ए-सज्दा
मैं हूँ इस राह में तन्हा मुझे मालूम न था

मैं ग़म-ए-अह्द-ए-तअ'ल्लुक़ को भुला बैठा था
दिल का हर ज़ख़्म है ताज़ा मुझे मालूम न था

देख कर हुस्न का उतरा हुआ चेहरा गुम हूँ
उन का ये हाल भी होगा मुझे मालूम न था

और भी कुछ दर-ए-ज़िंदाँ से निकलते ही 'वफ़ा'
सख़्त हो जाएगा पहरा मुझे मालूम न था